आश्चर्य ! 95% इंटरनेट से अनभिज्ञ हैं आम लोग

दिल्ली । 10 मार्च 2018 । आज जहां सारा विश्व इंटरनेट का दिवाना है और इसके माध्यम से नयी तकनीकी जानकारियां लोगों तक पहुंच रही हैं, फिर भी आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मात्र पांच प्रतिशत इंटरनेट का ही उपयोग आमजनों द्वारा किया जाता है। कहीं आप भी तो उन्हीं मे से एक तो नहीं ?

आइये, जानते हैं उसके बारे में,

संचार क्रांति के माध्यम से इंटरनेट आज जन सामान्य की भाषा बन चुका है। इंटरनेट के माध्यम से आज प्रतिदिन करोड़ों लोग बगैर किसी झंझट के अपना कार्य पूर्ण करते हैं। यहां तक कि यह आर्टिकल भी आप इंटरनेट के माध्यम से पढ़ रहे हैं ।सामान्यतः हम सोचते हैं कि वास्तव में इंटरनेट की दुनिया काफी बड़ी है, जहां से गुगल, याहू, बिंग आदि विभिन्न सर्च इंजनों के माध्यम से हर जानकारी पलक झपकते ही प्राप्त कर लेते हैं। इस संबंध में आपको बताना चाहते हैं कि विभिन्न सर्च इंजनों के माध्यम से जो जानकारी हमें प्राप्त होती हैं वह पूरे इंटरनेट का मात्र 5 से 10 प्रतिशत ही होता है । बाकी 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जिसे हम सामान्य ब्राउज़र से न तो खोल सकते हैं ना ही इंटरनेट पर देख सकते हैं ।इसका उपयोग करने के लिए TOR ब्राउज़र

(“द ओनियन रूटर”) का उपयोग करना होगा।

इंटरनेट का विचार 1960 में यूएस के कैलिफोर्निया में विकसित होना शुरू हुआ

। सर्वप्रथम इस संबंध में लियोनार्ड क्लिनराक ( Leonard kleinrkck ) ने अपने पहले लेख ” lnformation flow in large communication nets ” द्वारा 31मई 1961 को अपने विचार प्रकाशित कियेे। उसी सोच को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 1962 में IPTO ( Information processing technology office ) के निदेशक जेसीआर

लिकलिड्र ( JCR Licklidr) ने कम्प्यूटर के आंतरिक नेटवर्क के विचार को लोगों तक पहुंचाया। उपरोक्त दोनों महानुभावों के विचार से प्रेरित होकर रावर्ट टॉयलर ने नेटवर्क तैयार करने में उनकी मदद की। इसी प्रकार अनेकों प्रयासों के बाद जो प्रथम नेटवर्क तैयार हुआ वह यू. एस. की मिलिट्री द्वारा अपने विशेष कार्यों हेतु वर्ष 1969 में प्रयोग किया गया था। उस समय इसे ARPANET ( ऐडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट एडमिनिस्ट्रेशन नेटवर्क ) का नाम दिया गया था। फिर नेशनल साइंस फाउंडेशन द्वारा इसका नाम बदलकर NSFNET ( नेशनल साइंस फाउंडेशन नेटवर्क )किया गया। तदुपरांत 1980 में इसे सामान्य जनों के उपयोगार्थ चालू किया गया।
आज वर्तमान समय में सेवाओं के अनुसार इंटरनेट को मुख्यतः तीन भागों में वर्णित किया गया है –
1.सरफेस वेब
2. डीप वेब
3. डार्क वेब

1.सरफेस वेब – सरफेस वेेेब इंटरनेट का वह हिस्सा होता है जिसमें हम गुगल, याहू,बिंंग आदि सर्च इंजनों के माध्यम से उपयोग करते हैं । विश्व में सर्वाधिक इसी वेब का प्रयोग होता है। सरफेस वेब में सर्च इंजन की सहायता से हम किसी भी वेबसाइट को एक लिमिट में रहकर देख सकते हैं। इसमें हम वही देख सकते हैं जो हमें उसका एडमिन दिखाना चाहता है। इसमें हम चाह कर भी एडमिन एरिया को न तो खोल सकते हैं न ही उसका उपयोग कर सकते हैं।
2. डीप वेब – डीप वेब इंटरनेट का वह हिस्सा होता है जिससे आम लोग अनभिज्ञ हैं। इसे इनविजीवल वेब के नाम से जाना जाता है।
इसे हम इंटरनेट पर सर्च करके नहीं पा सकते हैं, क्योंकि यह “नो इन्डेक्स” वेबसाइट होती है। सामान्यतः हम अपने फोटो,विडियो, फाइल आदि क्लाउड स्टोरेज में सेब करते हैं। इसके लिए कई वेबसाइट भी मौजूद हैं। क्लाउड स्टोरेज की जितनी भी वेबसाइट होती हैं वे डीप वेब के अंतर्गत आती हैं। वैसे डीप वेब का वास्तविक आकार मापना असंभव है , फिर भी विशेषज्ञों के अनुसार इसका आकार सरफेस वेब से लगभग 500 गुना बड़ा माना जाता है। इन्हें हम तभी प्रयोग कर सकते हैं जब हमारे पास उनका फिक्स URL तथा उसका पासवर्ड हो अर्थात इस प्रकार की वेबसाइट पर गोपनीय जानकारी सुरक्षित रखी जाती हैं व गोपनीय डाटा एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है या फिर डेटाबेस बनाकर सुरक्षित रखा जाता है। इसका उपयोग अधिकांश सरकारी दस्तावेज, वैज्ञानिक शोध आदि को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है । इन वेबसाइटों को वही लोग संचालित कर सकते हैं जिन्हें इसको संचालित करने के लिए मान्य किया गया हो और उनके पास उनका पासवर्ड हो ।
3. डार्क वेब – डार्क वेब इंटरनेट का गैरकानूनी क्षेत्र होता है ,जहां जाने कि हम आपको मनाही करते हैं। यहां उसकी जानकारी सिर्फ ज्ञान के लिए दी जा रही है। यह इंटरनेट का अवैध क्षेत्र कहलाता है इसलिए इस क्षेत्र पर जाना और उसका उपयोग करना पूरी तरह अवैध है।
इस वेब का प्रयोग करने के लिए स्पेशल इंटरनेट ब्राउज़र की आवश्यकता होती है जिसे TOR ब्राउज़र (“द ओनियन रूटर”) कहते हैं। इसके द्वारा अवैध ढंग से नशीली दवाओं के व्यापार, फ्राड के तरीके, आतंकियों को धन देेेने, नकली करेंसी, वायरस, हैकिंग, पाइरेटेड साफ्टवेयर, शूटर हायर करनेे, कारडिंग सम्बन्धित अवैध कार्य किए जाते हैं । इसमें किसी देश की भी करेंसी का प्रयोग नहीं किया जाता है बल्कि सारा लेनदेन बिटकॉइन के माध्यम से संचालित होता है।
**** इंटर नेट के मजेदार तथ्य *****
@. विश्व का पहला सर्च इंजन आर्ची नाम से शुरू किया गया था।
@. 1971 पहला ई मेल रे टामलिन्सन द्वारा भेजा गया था, पर मजे की बात यह रही कि विश्व के पहले टेक्स्ट ई मेल भेजने वाले को यह भी याद नहीं है कि उस मैसेज में उन्होंने क्या लिखा था।
@. इंटरनेट के प्रारंभ से लेकर स्थापित होने तक इसे अनेकों मतभेदों का भी सामना करना पड़ा। वर्ष 1995 में रावर्ट मेडकॉल्फ नें इंटरनेट की हंसी उडा़ते हुए कहा था कि यह प्रयोग साल दो साल बाद धराशाई हो जाएगा और इसका कोई भी उपयोग नहीं होगा। अपनी बातों को वजन देते हुए उसने कहा था कि यदि मेरी कही बात गलत हुई और यह लंबे समय तक चलता रहा तो मैं अपने कहे शब्दों को पी जाऊंगा। बाद में जब इंटरनेट का व्यापक प्रसार हुआ और यह तेजी से लोगों तक पहुंचने लगा तो वर्ष 1997 में रावर्ट मेडकाल्फ ने, इंटरनेट की बढ़ती लोकप्रियता को देख ,अपने शब्दों को वापस लेने के लिए 1995 में अपनी दी गई स्पीच पेपर का प्रिंट निकाल कर उसे ग्राइंड कर पानी में घोलकर पी लिया था ।
@. टीम बर्नर्स ली ने 1997 में पहला वेब पेज (www) बनाया था।
@. वर्ष 2011 में फिजिसिस्ट रसेल सीज के अनुसार इंटरनेट इलेक्ट्रानों से निर्मित है और प्रवाहित हो रहे सम्पूर्ण इंटरनेट का वजन लगभग 50 ग्राम (एक स्ट्राबेरी के वजन) के आस पास बताया गया है

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