नहीं मिला बेघरों को घर और सरकारी आवास हो गये वापस

जमीनी हकीकत से दूर हैं सरकारी आंकड़े

गाजीपुर(उत्तर प्रदेश),8 फरवरी 2018। कागजी आंकड़ों तथा जमीनी हकीकत में कितना बड़ा फासला होता है, इसका ज्वलंत उदाहरण जिले में देखने को मिला है। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी गरीब, बेबस मजदूर अपनी गरीबी और आवास हीनता के चलते हजारों बेघर मजदूर प्लास्टिक और बांस के सहारे बगीचों व खाली पड़ी जमीनों पर किसी तरह अपने व परिवार के जीवन यापन को मजबूर हैं क्योंकि उनके पास सिर ढकने के लिए कोई मकान या जगह नहींहै। वास्तविक इस जमीनी हकीकत के बाद यहां का जिला प्रशासन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि जिले में अब कोई बेघर बचा है और उसे प्रधानमंत्री आवासीय योजना के तहत आवास का लाभ दिया जा सके।जिला ्प्रशासन अब इससे मुंह नहीं मोड़ सकता क्योंकि सम्भवतः यही दलील देकर दलितों के लिये आए 2500 प्रधानमंत्री आवास लौटा दिये हैं। जिलाधिकारी और सीडीओ का कहना है कि 2011 की रैंक सूची के मुताबिक उसे पात्र ही नहीं मिले फलस्वरूप आवास सरेंडर कर दिये गए। यह जानकारी पाकर जिले के प्रभारी मंत्री बृजेश पाठक भी दंग रह गए। उन्होंने समीक्षा बैठक में सीडीओ और जिलाधिकारी की जमकर क्लास ली। दोनों अधिकारी मंत्री जी को सफाई देते रहे। जबकि बास्तविकता है किआज भी लोग झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। जिले का बुद्धिजीवी वर्ग प्रशासनिक अधिकारियों की इस बात से कत्तई इत्तेफाक नहीं रखता। उनका कहना है कि यदि प्रशासनिक स्तर पर इसी तरह के फैसले होते रहे तो सरकार का ‘सबका साथ- सबका विकास’ का नारा थोथा साबित हो जायेगा। सीएम योगी का हर दलित और वनवासियों को घर देने का वादा कैसे पूरा हो पाएगा। जिले के जनप्रतिनिधियों का ध्यान आकृष्ट कराते हुए समाजसेवियों तथा बुद्धिजीवियों में बेघर गरीबों को आवास प्रदान कराने का आग्रह सरकार से किया है ।

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